लखनऊ/नई दिल्ली: Assembly Speaker Vijendra Gupta दिल्ली विधानसभा के अध्यक्ष विजेन्द्र गुप्ता ने कहा कि लोकतंत्र की वैधता जवाबदेही के प्रावधानों के अस्तित्व से नहीं, बल्कि इस बात से तय होती है कि विधायिकाएं उन्हें कितनी गंभीरता और ईमानदारी से लागू करती हैं। वे लखनऊ में आयोजित तीन दिवसीय 86वें अखिल भारतीय पीठासीन अधिकारी सम्मेलन (एआईपीओसी) को संबोधित कर रहे थे। देशभर से आए पीठासीन अधिकारियों को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा कि विधायी जवाबदेही जनता और उनके निर्वाचित प्रतिनिधियों के बीच एक जीवंत और गतिशील संबंध है, जो लोकतंत्र की नैतिक और संवैधानिक आधारशिला है।
संवैधानिक लोकतंत्र में विधायिकाओं की केंद्रीय भूमिका को रेखांकित करते Assembly Speaker Vijendra Gupta
संवैधानिक लोकतंत्र में विधायिकाओं की केंद्रीय भूमिका को रेखांकित करते हुए अध्यक्ष ने कहा कि विधायिकाएं केवल प्रक्रियात्मक संस्थाएं नहीं हैं, बल्कि लोकतांत्रिक शासन की सबसे प्रत्यक्ष और सशक्त अभिव्यक्ति हैं। न्यायपालिका जहां संवैधानिक मूल्यों की रक्षा करती है और कार्यपालिका शासन का संचालन करती है, वहीं कार्यपालिका की सत्ता विधायिका से ही प्रवाहित होती है और वह सदन के प्रति सामूहिक रूप से उत्तरदायी रहती है।
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विधायी संस्थाओं की ऐतिहासिक विरासत का उल्लेख करते हुए उन्होंने विठ्ठलभाई पटेल को स्मरण किया, जिन्होंने 1925 में केंद्रीय विधान सभा के अध्यक्ष का पद संभाला था। 20 जनवरी 1930 की घटना का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि किस प्रकार विठ्ठलभाई पटेल ने अध्यक्ष की गरिमा और सदन की सर्वोच्चता की रक्षा कर विधायिका की स्वतंत्रता और शक्तियों के पृथक्करण की परंपरा को मजबूत किया।
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अध्यक्ष ने कहा कि सदन में दिए गए मंत्रिस्तरीय आश्वासन औपचारिक दायित्व होते हैं और विधायी जवाबदेही का एक महत्वपूर्ण स्तंभ हैं। आश्वासन समितियों सहित विभिन्न विधायी समितियों की भूमिका पर प्रकाश डालते हुए उन्होंने कहा कि ये समितियां आश्वासनों के क्रियान्वयन की निगरानी कर जनता के विश्वास को मजबूत करती हैं।
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समकालीन सुधारों की चर्चा करते हुए उन्होंने विधायी कार्यप्रणाली में प्रौद्योगिकी और डेटा-आधारित शासन की भूमिका पर बल दिया। राष्ट्रीय ई-विधान अनुप्रयोग (नेवा) के तहत दिल्ली विधानसभा में हुए पेपरलेस सत्रों का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि इससे पारदर्शिता और दक्षता बढ़ी है और पर्यावरण संरक्षण में योगदान मिला है, जिससे लगभग 80 पेड़ों की बचत संभव हुई है।
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उन्होंने राष्ट्रीय विधायी सूचकांक (एनएलआई) को भी महत्वपूर्ण बताया, जो बैठकों की संख्या, कार्यघंटों, बहस की उत्पादकता और समितियों की प्रभावशीलता जैसे मानकों पर राज्यों की विधायी कार्यक्षमता का तुलनात्मक आकलन प्रस्तुत करता है। उनके अनुसार यह ढांचा पारदर्शिता, आत्ममूल्यांकन और सर्वोत्तम प्रथाओं को अपनाने के साथ-साथ स्वस्थ प्रतिस्पर्धा को भी प्रोत्साहित करता है।
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