New Delhi 2026: दिल्ली हाईकोर्ट ने ‘आप’ नेता गोपाल राय को जारी किया अवमानना नोटिस Delhi HC’s Tough Order to AAP Leader

Delhi HC’s Tough Order to AAP Leader 

नई दिल्ली: Delhi HC’s Tough Order to AAP Leader दिल्ली हाईकोर्ट ने शुक्रवार को आम आदमी पार्टी (आप) के नेता गोपाल राय और खोजी पत्रकार सौरव दास को नोटिस जारी किया है। यह नोटिस एक आपराधिक अवमानना याचिका के तहत जारी किया गया है, जिसमें आरोप लगाया गया है कि दोनों ने सोशल मीडिया पर ऐसे आपत्तिजनक और अवमाननापूर्ण सामग्री प्रसारित की, जो न्यायमूर्ति स्वर्णकांता शर्मा के खिलाफ थी। यह मामला कथित आबकारी नीति केस से जुड़ा बताया जा रहा है। अशोक चैतन्य की ओर से दायर याचिका में आप के राष्ट्रीय संयोजक व पूर्व मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल और पार्टी नेता सौरभ भारद्वाज के खिलाफ भी अवमानना की कार्यवाही शुरू करने की मांग की गई थी।

दिल्ली हाईकोर्ट ने अमीक्स क्यूरी नियुक्त किया, अवमानना मामले की सुनवाई 4 अगस्त को Delhi HC’s Tough Order to AAP Leader

नई दिल्ली: Delhi HC’s Tough Order to AAP Leader  हालांकि, न्यायमूर्ति नवीन चावला और रविंदर डुडेजा की खंडपीठ ने कहा कि केजरीवाल और सौरभ भारद्वाज को पहले ही उच्च न्यायालय द्वारा स्वतः संज्ञान अवमानना कार्यवाही में नोटिस जारी किया जा चुका है। अदालत ने दोनों मामलों को एक साथ सुनने का निर्देश दिया और अगली सुनवाई 4 अगस्त के लिए तय की। साथ ही, नए पक्षकारों को जवाब दाखिल करने का आदेश दिया गया और सोशल मीडिया सामग्री को सुरक्षित रखने के निर्देश दिए गए। अदालत ने वरिष्ठ अधिवक्ता राजदीपा बेहुरा को अमीक्स क्यूरी नियुक्त करते हुए उन्हें सभी संबंधित दस्तावेज उपलब्ध कराने का भी निर्देश दिया। याचिका में आरोप लगाया गया है कि जब अरविंद केजरीवाल और अन्य आरोपियों को आबकारी नीति भ्रष्टाचार मामले में ट्रायल कोर्ट से राहत मिली,

आबकारी नीति मामले में जज पर पक्षपात के आरोप, हाईकोर्ट ने जताई चिंता Delhi HC’s Tough Order to AAP Leader

नई दिल्ली: Delhi HC’s Tough Order to AAP Leader  तो सीबीआई ने दिल्ली हाईकोर्ट में रिवीजन याचिका दायर की, जो न्यायमूर्ति स्वर्णकांता शर्मा के समक्ष सूचीबद्ध हुई। इसके बाद आरोप है कि न्यायमूर्ति शर्मा से मामले को हटाने और उन्हें सुनवाई से अलग करने की कोशिशों के दौरान सोशल मीडिया पर समन्वित अभियान चलाया गया, जिसमें न्यायाधीश पर पक्षपात और हितों के टकराव जैसे गंभीर आरोप लगाए गए। अदालत ने पहले के आदेशों में कहा था कि न्यायपालिका को बदनाम करने के लिए चलाए गए ऐसे अभियान न्यायिक प्रक्रिया में हस्तक्षेप करने और संस्था की गरिमा को प्रभावित करने का प्रयास हैं,

जबकि आलोचना की एक सीमित सीमा स्वीकार्य है। बाद में न्यायमूर्ति स्वर्णकांता शर्मा ने स्वयं इस मामले से खुद को अलग कर लिया और मामला दूसरी बेंच को सौंप दिया गया।

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