बुरे-स्वप्नों का विज्ञान और उनके प्रकार Nightmares

Nightmares

Nightmares: दुःस्वप्न या Nightmares ऐसे भयावह सपने होते हैं जो नींद के दौरान व्यक्ति को डर, घबराहट, बेचैनी या असुरक्षा का अनुभव कराते हैं। ये प्रायः नींद के REM (Rapid Eye Movement) रैपिड आई मूवमेंट के चरण में आते हैं, जब दिमाग़ अत्यधिक सक्रिय रहता है तब सपने देखने की संभावना सबसे अधिक होती है।

वैज्ञानिक दृष्टिकोण से

Nightmares

वैज्ञानिक दृष्टिकोण से देखा जाए तो दुःस्वप्न मस्तिष्क की भावनात्मक प्रक्रिया से जुड़ा होता है। मस्तिष्क का Amygdala (अमिग्डाला) भाग डर और खतरे से संबंधित भावनाओं को नियंत्रित करता है। जब किसी व्यक्ति पर तनाव, आघात (Trauma), चिंता या नींद संबंधी विकारों का दबाव होता है, तब अमिग्डाला अत्यधिक सक्रिय हो जाता है और भय से जुड़ी तस्वीरे सपनों के रूप में प्रकट होतीं हैं।

बचपन में दुःस्वप्न अधिक सामान्य होते हैं क्योंकि

प्रयोगों से पता चलता है कि बचपन में दुःस्वप्न अधिक सामान्य होते हैं क्योंकि उस अवस्था में बच्चों का दिमाग़ कल्पना और भय को तेज़ी से अनुभव करता है। वयस्कों में यह प्रायः तनाव, मानसिक आघात (जैसे दुर्घटना, हिंसा, PTSD), अस्वस्थ जीवनशैली, नींद की परेशानिया या दवाओं के दुष्प्रभाव के कारण उत्पन्न होते हैं।

बुरे-स्वप्नों के प्रकार

1. बार-बार आने वाले दुःस्वप्न (Recurrent Nightmares) – एक ही तरह का सपना बार-बार आना, जो अक्सर किसी गहरी चिंता या अपूर्ण भावनाओं से जुड़ा होता है।

2. तनाव-प्रेरित दुःस्वप्न (Stress-induced Nightmares) – अत्यधिक तनाव, परीक्षा की चिंता, नौकरी या रिश्तों की समस्याओं के कारण आने वाले सपने होते हैं ।

3. आघात-जन्य दुःस्वप्न (Trauma-related Nightmares) – दुर्घटना, हिंसा या PTSD जैसी स्थितियों से जुड़े डरावनें अनुभवों का बार-बार सपना देखना।

4. दवाओं या पदार्थों से जुड़े दुःस्वप्न (Substance-related Nightmares) – नींद की दवाओं, एंटीडिप्रेसेंट या नशे के सेवन के कारण उत्पन्न होने वाले सपने।

मनोवैज्ञानिकों का मानना है कि दुःस्वप्न एक प्रकार का “भावनात्मक क्रिया ” (Emotional Processing) है। यानी मस्तिष्क भयानक परिस्थितियों को सपनों में दोहराकर उन्हें समझने और नियंत्रित करने की कोशिश करता है।

बुरे या डरावनें सपनों को नियंत्रित करने के लिए अच्छी नींद की आदतें (Sleep Hygiene) महत्वपूर्ण हैं, जैसे नियमित सोने-जागने का समय, कैफीन और अल्कोहल से परहेज़, तथा सोने से पहले स्क्रीन का उपयोग कम करना। साथ ही, रिलैक्सेशन तकनीकें, योग-ध्यान, और Imagery Rehearsal Therapy जैसी मनोचिकित्सकीय तकनीकें दुःस्वप्न की तीव्रता को कम कर सकती हैं।

संक्षेप में, दुःस्वप्न केवल डरावने सपने नहीं हैं, बल्कि मस्तिष्क की जटिल भावनात्मक और न्यूरोलॉजिकल गतिविधियों का परिणाम हैं। इनके पीछे छिपे कारणों और प्रकारों को समझकर हम न केवल नींद की गुणवत्ता सुधार सकते हैं, बल्कि मानसिक स्वास्थ्य को भी बेहतर बना सकते हैं।

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