कैथल NH-152D Land Acquisition Case भारत सरकार द्वारा भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण (एन एच ए आई) के माध्यम से राष्ट्रीय राजमार्ग नंबर 152-डी के निर्माण और एनएच-44 के चौड़ीकरण के लिए विभिन्न गांवों में नैशनल हाइवे एक्ट के तहत अधिगृहीत की गई किसानों की कृषि भूमि की मुआवजा राशि बढ़वाने, भूमि दो हिस्सों में बंट जाने का हर्जाना व मुआवजा राशि देरी से अदा करने का ब्याज देने की मांग करते हुए भूस्वामियों/किसानों द्वारा दायर किए गए सालों से लंबित 84 केसों को उपायुक्त एवं अर्बिट्रेटर ने एकसाथ खारिज कर दिया है। इन सभी केसों में उनका फैसला एक ही दिन को घोषित किया गया है, जिससे भूस्वामियों/किसानों को करारा झटका लगा है और उनके दिलों को गहरा आघात पहुंचा है।
किसानों की कानूनी लड़ाई को झटका, DC ने 84 मुआवजा केस एक दिन में निपटाए NH-152D Land Acquisition Case
उल्लेखनीय है कि राष्ट्रीय राजमार्ग के निर्माण और चौड़ीकरण के लिए भारत सरकार के अनेक गांवों में किसानों की सैंकड़ों एकड़ कृषि भूमि को साल 2015 में गजट नोटिफिकेशन जारी कर अधिग्रहण किया था। सक्षम प्राधिकारी (भूमि अधिग्रहण)-एवं-जिला राजस्व अधिकारी ने अधिगृहीत भूमि का साल 2018 में कलेक्टर रेट के आधार पर किसानों को मुआवजा राशि देने का अवार्ड घोषित किया था। लेकिन भूस्वामी/किसान इस मुआवजा राशि से सहमत नहीं थे। किसानों/भूस्वामियों ने इस अवार्ड को चुनौती दी थी और याचिकाएं दायर कर अपनी अधिगृहीत भूमि की मुआवजा राशि बढ़वाने, भूमि दो हिस्सों में बंट जाने का हर्जाना व मुआवजा राशि देरी से अदा करने का ब्याज देने की मांग की थी, जो सालों से लंबित पड़े थे।
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पंजाब एवं हरियाणा उच्च न्यायालय ने राष्ट्रीय राजमार्ग के लिए अधिगृहीत भूमि की मुआवजा राशि से संबंधित पंजाब एवं हरियाणा राज्म में साल 2000 तक दायर किए गए सभी लंबित केसों का 28 फरवरी तक निपटारा करने का निर्देश दिया था। जिला करनाल में मुआवजा से संबंधित लंबित 84 केसों को उपायुक्त एवं अर्बिट्रेटर उत्तम सिंह ने 26 फरवरी को खारिज कर दिया है। इस फैसले पर अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए भूमि अधिग्रहण मामलों के ज्ञाता एडवोकेट चौधरी शक्ति सिंह ने कहा कि उपायुक्त एवं आर्बिट्रेशन का यह फैसला न्यायोचित एवं न्यायसंगत नहीं है और यह प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के भी खिलाफ है। इसमें कानूनी नियमों का सही से उल्लेख भी नहीं किया गया है। इस फैसले से जो भी भूस्वामी/किसान सहमत नहीं हैं वो उपायुक्त-एवं-आर्बिट्रेटर के इस फैसले को चुनौती दे सकते हैं और जिला न्यायालय में मध्यस्थता और सुलह अधिनियम के तहत निर्धारित समयावधि में अपनी आपत्ति याचिका दाखिल कर सकते हैं। उन्होंने भूस्वामियों/किसानों को आश्वस्त करते हुए कहा कि न्यायपालिका पर पूरा विश्वास और भरोसा रखें, आप सभी को अदालत से इंसाफ जरुर मिलेगा।
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